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सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर जताई चिंता, स्थानीय निकायों को लगाई फटकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश में कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों को प्रभावी रूप से लागू करने में विफल रहने के लिए नगर निगम अधिकारियों एवं स्थानीय निकायों की कड़ी आलोचना की है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारी की पीठ बुधवार को सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों एवं अन्य जानवरों के मुद्दे पर शीर्ष अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले में विस्तृत दलीलें सुन रही थी। इस मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। पीठ ने स्थिति की गंभीरता पर कहा, “हम जानते हैं कि ये घटनाएं हो रही हैं। बच्चे, वयस्क जानवरों के काटने का शिकार हो रहे हैं, लोगों की मौत हो रही है।” न्यायालय ने आगे कहा, “पिछले 20 दिनों में जानवरों के कारण न्यायाधीशों से जुड़े दो सड़क हादसे हुए हैं जिनमें से एक न्यायाधीश रीढ़ की हड्डी की गंभीर चोटों से जूझ रहे हैं। यह एक बहुत ही गंभीर मामला है।”

पिछले वर्ष न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने दिल्ली नगर निगम को आवारा कुत्तों को पकड़ने एवं आश्रय देने का निर्देश दिया था जिसके बाद आवारा कुत्तों का मुद्दा पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था, जिसका पशु अधिकार समूहों ने विरोध किया था। बाद में वर्तमान तीन न्यायाधीशों की पीठ ने उस आदेश में संशोधन किया और स्थायी आश्रय देने के बजाय नसबंदी किए गए कुत्तों का टीकाकरण करने और छोड़ने का आदेश दिया था।

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नवंबर 2025 में, उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकारों एवं भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को पूरे देश के राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया था कि आवारा कुत्तों के काटने से बचाव के लिए सरकारी एवं निजी शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संस्थानों के चारों ओर आठ सप्ताह के भीतर बाड़ लगाई जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ऐसे संस्थागत क्षेत्रों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को उसी स्थान पर वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उसके निर्देशों का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने न्यायालय को बताया कि एनएचएआई ने न्यायालय के निर्देशों को लागू करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की है। उन्होंने बताया कि लगभग 1,400 किलोमीटर राजमार्ग खंडों को संवेदनशील घोषित किया गया है और एनएचएआई ने संकेत दिया है कि राज्य सरकारों को आगे की कार्रवाई करनी होगी।

पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एनएचएआई स्वयं आवश्यकता पड़ने पर सड़कों की घेराबंदी या बाड़ लगाने के लिए कदम उठा सकता है। श्री अग्रवाल ने आगे कहा कि मवेशियों एवं आवारा कुत्तों के लिए आश्रय स्थल बनाने के लिए महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक विकास की आवश्यकता है। उन्होंने न्यायालय को यह भी बताया कि पशु कल्याण बोर्ड के अनुसार, भविष्य में प्रजनन को रोकने के लिए नर कुत्तों को नसबंदी में प्राथमिकता देनी चाहिए लेकिन एबीसी केंद्रों में कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।

श्री अग्रवाल ने पीठ को बताया कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब जैसे प्रमुख राज्यों ने अभी तक अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं किए हैं। पशु अधिकार याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने कहा कि इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया एक जिम्मेदार एवं मानवीय समाज को प्रतिबिंबित करना चाहिए। उन्होंने वैश्विक स्तर पर स्वीकृत सीएसवीआर मॉडल (पकड़ना, नसबंदी करना, टीकाकरण करना एवं छोड़ना) पर बल दिया और कहा कि इसने कुछ क्षेत्रों में कुत्तों की आबादी को बहुत हद तक कम कर दिया है।

उन्होंने टीका लगाए गए और बिना टीका लगाए कुत्तों को एक साथ रखने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि इससे रेबीज फैल सकता है। जब श्री सिब्बल ने कहा कि धार्मिक स्थलों की यात्रा के दौरान उन्हें कभी किसी कुत्ते ने नहीं काटा, तो अदालत ने टिप्पणी की, “आप भाग्यशाली हैं। लोगों को काटा जा रहा है, बच्चों को काटा जा रहा है।” पीठ ने यह भी कहा कि सड़कों पर जानवरों की मौजूदगी गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बन रही है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कि कुत्ते केवल कंपाउंड के अंदर ही रहते हैं, कहा “यह सिर्फ काटने की बात नहीं है। सड़कों को कुत्तों से मुक्त किया जाना चाहिए।”

श्री सिब्बल ने तर्क दिया कि कुत्तों को अंधाधुंध तरीके से हटाने से क्षेत्रीय शून्यता उत्पन्न होगी, जिससे और भी समस्याएं उत्पन्न होंगी। उन्होंने कुत्तों को खाना खिलाने के आर्थिक बोझ पर उल्लेख करते हुए दावा किया कि कुत्तों को हटाने के अभियानों के बाद कुछ क्षेत्रों में कुत्ते के काटने की घटनाएं बढ़ गई हैं। एनएएलएसएआर हैदराबाद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने आवारा कुत्तों को आश्रय देने के लिए आवश्यक अवसंरचना पर आंकड़े प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि भारत में 15 लाख से अधिक शिक्षण संस्थान हैं और एक औसत अनुमान के अनुसार, पूरे देश में 77,000 से अधिक आश्रयों की आवश्यकता होगी।

श्री वेणुगोपाल ने आगे कहा कि एबीसी नियमों के अनुसार नसबंदी किए गए कुत्तों को उसी स्थान पर वापस छोड़ना अनिवार्य है जहां से उन्हें उठाया गया था और उन्होंने न्यायालय से इस मुद्दे की व्यापक जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का आग्रह किया। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने कुत्तों को बड़े पैमाने पर हटाने का विरोध करते हुए चेतावनी दी कि अगर आवारा कुत्तों को पिंजरों में बंद किया गया तो इसके गंभीर एवं अपरिवर्तनीय परिणाम होंगे। उन्होंने बल देकर कहा कि टीका लगाए गए कुत्ते जब वापस छोड़े जाते हैं तो वह बिना टीका लगाए हुए कुत्तों को भी एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने बताया कि कई शैक्षणिक संस्थानों ने अपने क्षेत्रों में नसबंदी एवं टीकाकरण किए गए कुत्तों को रहने की अनुमति देकर आवारा कुत्तों को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है जिसके परिणामस्वरूप आक्रामकता नगण्य हुई है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि चहारदीवारी युक्त समुदायों, आवासीय कल्याण संघों (आरडब्ल्यूए) को एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से यह तय करना चाहिए कि क्या उनके परिसर में आवारा जानवरों को अनुमति दी जानी चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को सामूहिक सुरक्षा एवं सुविधा के साथ संतुलित करना चाहिए और कहा कि पशु कल्याण संबंधी चिंताएं उन निवासियों के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकतीं जो असुरक्षित महसूस करते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह और कई अन्य वकीलों ने भी अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित याचिकाकर्ता ने कथित रूप से कुत्तों के काटने वाली तस्वीरों को रिकॉर्ड पर रखा। मामले की आगे की सुनवाई गुरुवार को होगी।

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