दशकों बाद गंगा में हिल्सा की वापसी मछलियां, वैज्ञानिकों के चेहरे खिले

नई दिल्ली। दशकों तक गंगा नदी के मध्य और ऊपरी हिस्सों में लगभग विलुप्त हो चुकी प्रसिद्ध हिल्सा मछली की वापसी ने भारत के नदी पुनरुद्धार अभियान में एक नया इतिहास रच दिया है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में मिली दो हिल्सा मछलियों ने पर्यावरणवादियों और वैज्ञानिकों के चेहरे पर मुस्कान वापस ला दी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने बुधवार को यह जानकारी दी। परिषद के अनुसार सन1975 में फरक्का बैराज के निर्माण के बाद बंगाल की खाड़ी से गंगा के ऊपरी हिस्सों (वाराणसी और प्रयागराज) तक होने वाला हिल्सा का प्रवास गंभीर रूप से कम होता चला गया था। हाल ही में उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के टांडा खुर्द गांव (मार्कंडेय महादेव मंदिर के पास) में हिल्सा मछली के पाए जाने से यह साबित हो गया है कि वैज्ञानिक हस्तक्षेप और निरंतर प्रयासों से विलुप्तप्राय प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में वापस लाया जा सकता है।
ऐतिहासिक रूप से, हिल्सा मछली प्रजनन के लिए बंगाल की खाड़ी से गंगा नदी के रास्ते वाराणसी और प्रयागराज तक लंबा सफर तय करती थी। हालांकि, एक बैराज के चालू होने के बाद इसका अपस्ट्रीम (धारा के विपरीत) प्रवास रुक गया, जिससे न केवल गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा, बल्कि मछली पकड़ने वाले पारंपरिक समुदायों की आजीविका पर भी गहरा संकट खड़ा हो गया। हिल्सा के पारिस्थितिकीय, पोषण संबंधी और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए, परिषद के खास संस्थान केंद्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सिफरी), बैरकपुर ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के साथ मिलकर हिल्सा मत्स्य पालन को पुनर्जीवित करने के लिए एक दीर्घकालिक वैज्ञानिक कार्यक्रम शुरू किया।
इस रणनीति के तहत केवल पानी की गुणवत्ता सुधारने के बजाय जैव विविधता और मछली उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित किया गया। वैज्ञानिकों ने रिवर रैंचिंग अभियान के तहत 2019 से जून 2026 के बीच फरक्का बैराज के अपस्ट्रीम में 3.85 लाख से छोटी हिल्सा मछलियों को छोड़ा । इसके अलावा 40 लाख से अधिक मछली के निषेचित अंडे और लगभग 9.4 लाख हैचरी-निर्मित स्पॉन (2-6 दिन के बच्चे) नदी में छोड़े गए। इन मछलियों के प्रवास और जीवित रहने के स्वरूप को समझने के लिए टैगिंग और नियमित ट्रैकिंग की गई। लगभग तीन दशकों के लंबे इंतजार के बाद चंदौली के टांडा खुर्द में कुल 740 ग्राम वजन की दो हिल्सा मछलियां दर्ज की गईं। इससे पहले 2023-25 के दौरान की गई निगरानी में मिर्जापुर तक हिल्सा की आवाजाही दर्ज की गई थी, जो यह दर्शाती है कि यह प्रजाति धीरे-धीरे अपने ऐतिहासिक प्रवास मार्ग को दोबारा हासिल कर रही है।
सिफरी के निदेशक डॉ. प्रदीप डे के अनुसार मछली पालन पुनरुद्धार को केवल एक प्रजाति के संरक्षण के रूप में नहीं, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र के समग्र पुनरुद्धार और टिकाऊ आजीविका के रूप में देखा जाना चाहिए। हिल्सा जैसी संवेदनशील प्रजाति की वापसी गंगा नदी के सुधरते स्वास्थ्य और पारिस्थितिकीय जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण जैविक संकेतक है। यह सफलता दर्शाती है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नीतिगत समर्थन और सामुदायिक भागीदारी से नदियों के प्राकृतिक जीवन को दोबारा बहाल किया जा सकता है।









