Father’s Day Special : कड़ी धूप में घने वृक्ष की छाया हैं पिता

पितृ दिवस पर विशेष : कड़ी धूप में घने वृक्ष की छाया हैं पिता
-Vivek kumar Gupta

पाश्चात्य सभ्यता और भौतिकता के प्रभाव में आकर हम सनातन भारतीयों ने अपनी परंपराओं को कड़ी धूप में घने वृक्ष की छाया के समान पिता को मान्यता देने के लिए ‘फादर्स डे’, मां को सम्मान देने के उद्देश्य से ‘मदर्स डे’, मनाना सीख लिया है। और जो लोग भी हमारे कल्याण के लिए अपना योगदान देते हैं उनको भी सम्मान देने की भावना से ‘टीचर्स डे’, ‘नर्सिंग डे’, ‘फ्रेंडशिप डे’, ‘वैलेंटाइन डे’, आदि को एक रिचुअल के रूप में मना तो लेते हैं। पर मूल भावना से दूर होते जा रहे हैं और दिखावे के उद्देश्य से हम इन्हें मनाते हैं कि हम आपके प्रति बड़े कृतज्ञ है और हम अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। ऐसे में मजबूरन वह लोग भी थैंक यू बोलने की औपचारिकता निभा देते हैं असल बात तो यह है की अपनी संस्कृति में माता-पिता गुरु अतिथि को देव का स्थान देकर पूजनीय बताया गया है यहां तक की नदियों, सूर्य ,चंद्रमा को भी देव तुल्य मानकर उनके महत्व को समझा गया है इसी क्रम में हमने कुछ लोगों से उनके विचार जानने की कोशिश की। पेश है उनके विचार…….

1. कालका बिन्दादीन परिवार में जन्मे पंडित राम मोहन महाराज कथक के प्रख्यात कलाकार हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता पंडित शंभू महाराज से 6 वर्ष की अल्पायु में कथक की शिक्षा ली। पिताजी ने ही कथक और अभिनय की शैली सिखाई। वे कहते हैं कि हम दो भाई थे पर वह सबसे ज्यादा मुझे ही प्यार करते थे। मेरी जो भी मनपसंद चीज होती थी वह मेरे लिए जरूर लाते थे मुझे जो भी खाना पसंद था तो घर पर वही बनता था उन्होंने मुझे कथक की अच्छी तालीम दी । हम कथक के सातवी पीढ़ी हैं। वह हमेशा मुझे समझाते थे कि यह घराने की चीज है बस इसे करना है और करते रहना है जिंदगी में। पिताजी जब कहीं भी सीखाने जाते थे तो वह मुझे जरूर साथ लेकर जाते थे और मेरे लिए एक रुपए जरूर रखते थे कि बिस्किट खाएगा यहां तक कि वह मेरा बहुत ध्यान रखते थे। छोटी उम्र में ही उनको कैंसर हो गया था और उनका देहांत हो गया। पर उसके बाद जो हमारे गुरु थे पं बिरजू महाराज वह प्यार मुझे फिर उनसे मिला। और अपने पिता और गुरु के आशीर्वाद से ही आगे बढ़ रहे हैं। और जब भी मैं स्टेज पर नाचता हूं तो अपने पिता और गुरु का आह्वान करता हूं वह कहते हैं आप नाचिये हम तो सिर्फ माध्यम है। वही आते हैं और हमसे करवाते हैं तो पिता की याद तो मेरे मन से कभी जा ही नहीं सकती। आज वह हमारे बीच नहीं है पर हम जो भी करते हैं उनकी फोटो रखकर उनसे इजाजत लेकर ही कोई काम करते हैं। क्योंकि पिता के बराबर कोई नहीं। पिता ही ऐसा होता है कि बेटे को जो चाहिए वह पिता हाजिर कर देता है वही पिता सफल है जो अपने बेटे के नाम से जाना जाए। इस सुख को वही समझ सकता है जिसने इसका अनुभव स्वयं किया हो।

2. इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के महासचिव रामानंद कटियार कहते हैं कि भारतीय समाज में पिता सदैव पूज्य हैं पूरे अपने जीवन काल में और न रहने के पश्चात भी अपनी संतानों के लिए अपने परिवार के लिए एक वृक्ष की भांति रहता है जिस तरह वृक्ष सबको सब कुछ देता है फल देता है छाया देता है ऑक्सीजन देता है ईंधन देता है उसी प्रकार पिता अपने शरीर को अपने परिवार और अपने बच्चों के लिए खिलाता है और उसके बदले में वह कुछ नहीं चाहता है पिता सदैव पूज्यनीय है। पिता सदैव वंदनीय है। भारतीय समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने माता-पिता के उनके जीवन के प्रति अंतिम क्षण तक उनकी सेवा करनी चाहिए। उनके प्रति जितना भी बन सके अधिक से अधिक करने का प्रयास करना चाहिए। पितृ दिवस पर यही हमारा संदेश है और यही भारतीय समाज के प्रति नवयुवक नवयुवती से निवेदन है और प्रार्थना है।

3. मुंबई के मनोहर मोहब्बत अय्यर का कहना है फादर, बाप, पिता वह नहीं जो सिर्फ नाम देता है, यह वह नाम है, वह दर्जा है, जो हौसला देता है, फादस डे इस हौसले को सलाम करने का दिन है। फादर्स डे सिर्फ पैदा करने वाले बाप के लिए नहीं वह तो रस्म- ओ- रिवाज है, फादर्स डे तो उस खामोश ताकत के नाम है जो पीठ के पीछे चट्टान बनकर खड़ी रहती है उसे अजीम शख्स के नाम है, जो ढाल बनाकर खडा रहता है। जो अपने से छोटों को, नौजवानों को यह एहसास दिलाता है कि वह प्यारे हैं, मोहब्बत के काबिल है खास है, महफूज है, अहम है और उनकी कद्र की जाती है। आज उन सब फादर को सैल्यूट और सलाम है जिन्हें किसी की जिंदगी में फादर, बाप ,पिता का किरदार निभाया हो या निभा रहे हैं। फादर्स डे पर मैं यह नज्म खुद को, और मेरे हम खयालों को पेश करता हूं उस आजाद ख्याल, उदार और दरिया दिल बाप के ब्लीडिंग हार्ट बेटे (नरम दिल बेटे ) को नजम करता हूं, जो भारद्वाज बिरादरी से ताल्लुक रखता है।

4. लखनऊ के एक्सपर्ट आर्टिस्ट रूपल अग्रवाल बताते हैं कि पिता परमेश्वर होता है गलत नहीं कहा गया है… क्योंकि पिता आपको सब कुछ देता है आपके लिए सब करता है सब सहता है और उफ तक नहीं करता.. वह खुद को गलाता है तुम्हें सुख देने के लिए खुद को मिटाता है तुम्हें पूर्ण करने के लिए। सपने तुम देखते हो पर पूरे वो करता है उसका अपना कोई सपना नहीं होता… बस उसका परिवार सुखी रहे वो यही चाहता है पर हम कभी पिता को नहीं समझ पाए हमें सिर्फ उनके डांट याद रहती है वह कभी खुद को जाहिर नहीं करते अगर वह अपना प्यार दिखा दें तो मां और पिता में क्या फर्क रह जाएगा। पर वही है जो आपके जीवन की दिशा और दशा दोनों तय करते हैं और वही है जो आपको अपने से आगे जाते देखना चाहते हैं वह चाहते हैं कि आप उन्हें हरा कर उनसे भी आगे निकल जाएं और यह सिर्फ एक पिता ही चाहता है।

5. चंडीगढ़ की डॉक्टर नम्रता टंगड़ी बताती है कि एक पिता परिवार का आधार स्तंभ होने के साथ-साथ एक मौन नायक भी होता है। वह अपने प्रिय जनों का पालन पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करता है, त्याग करता है और हर चुनौती में मजबूती से खड़ा रहता है। एक मां के रूप में, मैं देखती हूं कि कैसे पिता का प्यार, धैर्य और मार्गदर्शन बच्चे के भविष्य को आकार देता है उनका आत्मविश्वास बढ़ाता है और घर में सुरक्षा लाता है । छोटी-छोटी जीतो का जश्न मनाने से लेकर कठिन समय में हमारा साथ देने तक, उनका समर्पण हर दिन प्रशंसा के योग्य है। मेरे पिता डॉ अश्वनी मल्होत्रा, ऐसे ही एक पिता है जिन्होंने जीवन भर मेरा मार्गदर्शन किया है। वे मेरे लिए चट्टान की तरह है। इस पितृ दिवस पर उन सभी अद्भुत पिताओं के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद, जो हमारे परिवारों के विकास और समृद्धि की मजबूत नींव है।

6. अभिनेता एवं निर्देशक रतन शर्मा की ओर से पिता वह छांव है, जो जीवन की हर कठिन राह को आसान बना देते हैं। पिता वह शक्ति है, जो हमें गिरकर फिर से उठना सीखाते हैं। उनका त्याग संघर्ष और समर्पण हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने अपने सपनों को त्याग कर हमारे भविष्य को संवारने का कार्य किया है। उनकी मेहनत और आशीर्वाद ही हमारी सफलता की असली नींव है। पिता का प्रेम शब्दों से नहीं बल्कि उनकी जिम्मेदारियो से झलकता है उनकी सीख हमें जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। हर कठिन परिस्थिति में उनका अनुभव हमारा मार्गदर्शन करता है। पिता परिवार की वह मजबूत नींव है, जिस पर पूरा घर टिका होता है उनके संस्कार ही हमारी सबसे बड़ी पहचान है। आज पिता दिवस के अवसर पर मैं अपने पिता सहित सभी पिताओं को श्रद्धा से नमन करता हूं। ईश्वर सभी पिताओं को स्वस्थ सुखी और दीर्घायु जीवन प्रदान करें। उनका स्नेह आशीर्वाद और मार्गदर्शन सदैव हम सभी पर बना रहे। पिता का सम्मान और आदर ही उनकी सबसे बड़ी खुशी है।

7. बाराबंकी की श्रद्धा वर्मा बताती है कि फादर्स डे, यह दिन पिताजी के योगदान को सम्मानित करने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए समर्पित है। यह दिन पिता के प्यार, त्याग और समर्थन को मान्यता देने का और उनके महत्व को समझने का एक अद्भुत अवसर है। फादर्स डे, पिताजी को यह एहसास दिलाने का एक खास मौका है कि उनकी उपस्थिति हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण है यह दिन सिर्फ उन्हें उपहार देने या कार्ड लिखने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह हमें इस रिश्ते को और भी मजबूत बनाने का अवसर प्रदान करता है। पिताजी द्वारा दिए गए मार्गदर्शन, प्रेम और सुरक्षा का कोई मोल नहीं होता है। मेरे पिताजी मेरे जीवन के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी मेहनत, समर्पण और जीवन के प्रति दृष्टिकोण ने मुझे हमेशा सकारात्मक रहने और मुश्किलों का सामना करने की ताकत दी है। उनका दृष्टिकोण और मार्गदर्शन मेरे लिए एक अनमोल है और मैं हमेशा उन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद मानती हूं।

8. शास्त्रीय गायक राहुल अवस्थी बताते हैं कि फादर्स डे पिता को सम्मान और प्रेम को व्यक्त करने का एक विशेष दिन है। हमारे जीवन में मार्गदर्शन ईमानदारी और जिम्मेदारी में लाये वही हमारे मार्गदर्शक हैं। जीवन में हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए सबसे पहले पिताजी हमें बताते हैं हालांकि यह समझ हमको बहुत समय बाद आती है कि वह क्या कहना चाह रहे हैं यह हर कठिन परिस्थिति में हमारा सहारा बनते हैं। उनका प्रेम निस्वार्थऔर अनमोल होता है। फादर्स डे हमें उनके त्याग और समर्पण को याद करने का अवसर देता है। इस दिन हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। आज संगीत के क्षेत्र में जो भी मेरा नाम हुआ है और जो भी मुझे सम्मान प्राप्त है वह मेरे पिताजी के दिव्य मार्गदर्शन के कारण संभव है। पिता क्या है वह आपसे क्या चाहता है वह तभी जान पाते हैं जब आप किसी के पिता बने और अपने से बेहतर बनाने के लिए परवरिश दें।

9. दिल्ली के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अभि दा फादर्स डे पर अपनी कविता के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहते हैं कि पापा चले गए, ना जाने क्या-क्या कर गये, हर एक जरूरत पर, मेरे साथ थे खड़े , स्कूल कैसे जाना है, सोचा कभी नहीं, पापा है ले जाएंगे ,चिंता करीनहीं, पापा चले गए ना जाने… कैसे भरी जाएगी कॉलेज की फीस कैसे भरी जाएगी इंजी मेडी की, ऐसी चिंता कभी हमारे मध्य नहीं रहे लोन हो या ब्याज हो वह भरते रहे सभी, पापा चले गए ना जाने… किसी पार्टी में जाना हो या मित्रों के घर, कभी घूमने को जाना हो जैसे चिड़ियाघर स्कूटर से ले जाने को तत्पर खड़े रहे जाने कितने ऐसे किस्से, गढकर चले गए, पापा चले गए न जाने… शादी में भी कैसे क्या-क्या खर्च करते रहे, लोगों ने टोका टाका मन मेरा भरते रहे देश घुमाया पांच सितारा होटल भी ले गए, सोचा कभी नहीं कितना सब खर्च करते रहे पापा चले गए न जाने… मेरा, मेरे बच्चों तक का बचपन बना गए। सबको खुश करते रहते, घर गुलजार कर गए, हम सो जाएं समय से ही इस हित बच्चे सुला रहे, उसके बाद न जाने कितनी कविताएं लिख गए, पापा चले गए ना जाने…।

10. बाराबंकी की सुनैना जायसवाल का मानना है कि पिता का स्थान एक बेटी के जीवन में सबसे अनमोल और मार्गदर्शन करने वाला होता है। पिता न सिर्फ उसके रक्षक होते हैं बल्कि उसके आत्मविश्वास सपनों और आत्मनिर्भरता की पहली नींव होते है। बेटी के हर छोटे से सपने को पिता ने अपनी आंखों में बसाया। आंसू पोछकर जो हिम्मत बढाये वह पिता है जो बेटी के वजूद को एक मजबूत उड़ान दे जाए। वह अभियान भी है और हौसला भी, पिता एक बेटी को पहला प्यार उसके साये में पले सारे अरमान वही तो बेटी का सबसे बड़ा संसार है। मेरे पिताजी का प्यार शब्दों से नहीं उनके कार्यों और उनके हर फैसला से दिखता है। मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किया है उसमें उनका योगदान अनमोल है। वो न केवल मेरे पिता है, बल्कि मेरे आदर्श, मार्गदर्शन और सबसे बड़े समर्थन दाता भी है।
एक रिटायर्ड पिता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया की एक अनाम पिता कितना अपने को पीता रहता है बेबसी के साथ जीता है यह तब पता लगता है कि जब वह पहली बार पिता बनता है। अपने पिता के बल पर तन कर खड़ा होता है लेकिन अपने बेटे बेटी की बारी होती है तो एक तरफ आत्मबोध दूसरी तरफ परवरिश। मां दूध तो पिला देती है लेकिन गरीब बाप को दूध खरीदने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह वही जानता है।
प्रसंग वश आप बीती याद आ रही है जब अबोध पुत्र ने पिता के साथ चिड़ियाघर के बाहर बाईनाकुलर दिलवाने की जिद कर दी उस वक्त तो पिता ने कहा शाम को ला देंगे। आॅफिस से जब घर वापस जाने लगे तो चिंतित दिखे की जेब में सिर्फ 3 रूपए हंै, क्या करें? तभी एक चपरासी जो किसी का पिता भी था बोला बाबूजी क्या सोच रहे हैं? तो हमारी बेबसी को चेहरे पर पढ़ कर बोल उठा तो ‘बाबूजी ईमा का सोच रहे हो लरिका की आंखन मां आंसू ना आवै दीहो लेव हमसे 10 रूपए लेव और लरिका खातिर ऊ लई जाओ जवन आप सवेरे ऊका दिवाय नाही पायो’। शर्म से गडकर उससे 10 रूपए लिए और चिड़ियाघर के बाहर बाईनाकूलर खरीद घर जाकर बच्चे को दिया। वह खुशी से झूम उठा कहने लगा ‘पापा यू आर द बेस्ट पापा। माई पापा इज दि बेस्ट।’
आज घटना को घटे 40 साल हो गए चपरासी बाप अब जिंदा नहीं है लेकिन उस पिता को श्र(ा पूर्वक नमन करते आंखें नम हो जाती हैं। इसको कौन बेटा समझ पाएगा इसलिए बाप बनना बड़े गौरव की बात होती है यह बेबसी को पीने के बाद ही संभव होता है।
चर्चा के मूल में जो भावना थी उसे किसी ने भी व्यवहारिकता की धरातल पर मानने, जानने और करने के प्रति अपनी विवशता जाने अनजाने व्यक्त कर दी। काश, इसके मर्म को वे समझ पाते और व्यवहार में लाते तो इस तरह के ‘डाॅक्टर्स डे’, ‘फादर्स डे ’ या कोई अन्य ‘डे ’ मनाने की जरूरत नहीं पड़ती।








