उत्तर प्रदेशताजा खबरभारत
24 Today
‘ऑपरेशन न्याय’: तत्कालीन एसीपी राधा रमण सिंह की सटीक तफ्तीश के आगे ढेर हुआ 7 वर्षीय मासूम का गुनहगार
0 34 3 minutes read
-
- लखनऊ पुलिस की स्पेशल टीम ने बुना कानूनी चक्रव्यूह; DNA और तकनीकी साक्ष्यों के आगे ढेर हुआ मो० सरजू शेख
- पॉक्सो अदालत ने 7 वर्षीय अबोध बालिका से क्रूरता करने वाले दोषी को सुनाई शेष प्राकृतिक जीवनकाल तक सश्रम जेल की सजा
- दोषी पर ₹50,000 का अर्थदंड; पुलिस टीम की समयबद्ध चार्जशीट और तत्परता की कोर्ट में सराहना
लखनऊ। राजधानी के विभूतिखंड क्षेत्र में 7 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुई हैवानियत के मामले में पॉक्सो अदालत के विशेष न्यायाधीश कुमार प्रशान्त ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने दोषी मोहम्मद सरजू शेख को शेष प्राकृतिक जीवनकाल तक सश्रम आजीवन कारावास और ₹50,000 अर्थदंड की सख्त सजा दी है। इस अंधेर केस को महज 18 महीने के भीतर मुकाम तक पहुंचाने और मासूम को न्याय दिलाने में लखनऊ पुलिस के जांबाज अधिकारियों की स्पेशल टीम की पेशेवर कार्यप्रणाली सबसे बड़ी ढाल बनी।
एसीपी राधा रमण सिंह की टीम ने बुना कानूनी चक्रव्यूह
इस बेहद संवेदनशील और जघन्य मामले की कमान मिलते ही तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (ACP विभूतिखंड) राधा रमण सिंह ने एक विशेष टीम का गठन किया था। इस टीम ने घटना के तुरंत बाद फरार हुए आरोपी की धरपकड़ के लिए दिन-रात एक कर दिया।
टीम ने तकनीकी इनपुट्स के आधार पर जाल बिछाकर मुख़बिर की सूचना पर आरोपी को हनीमैन रेलवे क्रॉसिंग के पास से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के दौरान शातिर अपराधी सरजू शेख ने पुलिस टीम पर सीधे फायरिंग झोंक दी थी, लेकिन पुलिसकर्मियों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए जवाबी कार्रवाई की, जिसमें आरोपी के पैर में गोली लगी और उसे दबोच लिया गया।
वैज्ञानिक तफ्तीश और 26 फॉरेंसिक साक्ष्यों की जुगलबंदी
आरोपी को केवल जेल भेजना ही नहीं, बल्कि उसे सख्त सजा दिलाना पुलिस टीम का मुख्य लक्ष्य था। इसके लिए एसीपी राधा रमण सिंह की टीम ने पारंपरिक पुलिसिंग से हटकर आधुनिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर पूरा जोर दिया:
-
- DNA की अचूक कड़ाई: पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) को कुल 16 सीलबंद लिफाफों में 26 जैविक नमूने भेजे थे। वैज्ञानिक अधिकारी डॉ० प्रतिभा तिवारी की जांच में दोषी के नमूनों का पीड़िता के DNA से शत-प्रतिशत मिलान पाया गया, जो कि निर्भया केस के विधिक सिद्धांतों के तहत अकाट्य सबूत बना।
- सटीक CDR मैपिंग: आरोपी ने अदालत में झूठा दावा (Plea of Alibi) किया था कि वह घटना के वक्त चिनहट में था। लेकिन पुलिस टीम द्वारा संकलित किए गए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) ने उसकी लोकेशन सीधे घटनास्थल (लेबर कैंप) पर प्रमाणित कर उसके झूठ के परखच्चे उड़ा दिए।
- समयबद्ध आरोप-पत्र: टीम की मुस्तैदी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि घटना के तत्काल बाद 21 अप्रैल 2025 को ही न्यायालय में पुख्ता चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी।
कोर्ट में खुद साक्षी बनकर खड़े हुए पुलिस अधिकारी
मुकदमे के ट्रायल के दौरान कानून के शिकंजे को और कसने के लिए तत्कालीन विवेचक राधा रमण सिंह स्वयं अदालत में अभियोजन साक्षी के रूप में कटघरे में खड़े हुए। उन्होंने अपनी टीम द्वारा जुटाए गए नक्शा-नजरी, मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक साक्ष्यों की पूरी कड़ी को अदालत के सामने इस तरह पेश किया कि बचाव पक्ष के वकीलों के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
कोर्ट की टिप्पणी: अपराधियों में खौफ पैदा करेगा यह फैसला
विशेष न्यायाधीश कुमार प्रशान्त ने अपने आदेश में पुलिस टीम की प्रभावी पैरवी और साक्ष्य संकलन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे नृशंस अपराधियों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जा सकती। कोर्ट ने आदेश दिया कि दोषी से वसूला गया ₹50,000 का अर्थदंड पीड़िता के पुनर्वासन के लिए दिया जाए। साथ ही, पीड़िता को अतिरिक्त वित्तीय सहायता दिलाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ को संस्तुति भेजी गई है।
लखनऊ पुलिस की इस जांबाज टीम की मुस्तैदी ने साबित कर दिया है कि यदि कानून के रखवाले वैज्ञानिक सोच और तत्परता से काम करें, तो हर मासूम को न्याय मिलना तय है।
0 34 3 minutes read








