
बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार ने उस विवादास्पद अध्ययन को अपनी वेबसाइट से हटा दिया है, जिस पर राज्य के 80 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने विश्वास जताते हुए चुनावी प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएमएस) को भरोसेमंद माना था। अगस्त 2025 के उस अध्ययन को कुछ दिन पहले सार्वजनिक किया गया था, लेकिन अब वह कर्नाटक निगरानी और मूल्यांकन प्राधिकरण (केएमईए) की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है।
उल्लेखनीय है कि योजना, कार्यक्रम निगरानी और सांख्यिकी विभाग के तहत केएमईए द्वारा किये गये इस अध्ययन में ईवीएम और पूरी चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं का काफी भरोसा सामने आया था, जो सीधे-सीधे कांग्रेस और लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान के खिलाफ था।मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि अध्ययन में कर्नाटक के 80 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने ईवीएम पर भरोसा जताया, जिससे कांग्रेस नेतृत्व की धारणा पर सवाल उठने लगे और उसकी आलोचना हुई।
इस अध्ययन में 102 विधानसभा क्षेत्रों के 5,100 मतदाता शामिल थे, जिसमें राज्य के सभी चार प्रशासनिक संभागों-बेंगलुरु, बेलगावी, मैसूरु और कलबुर्गी को कवर किया गया था। इसे कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी ने शुरू किया था और मैसूरु स्थित गैर-सरकारी संगठन ग्राम (ग्रासरूट्स रिसर्च एंड एडवोकेसी मूवमेंट) के सहयोग से किया गया था। कांग्रेस नेताओं को उनके ‘वोट चोरी’ अभियान पर हो रही आलोचना के जवाब में पार्टी प्रतिनिधियों ने दावा किया कि यह अध्ययन केवल चुनाव आयोग की तारीफ करने के लिए की गयी थी और जोर देकर कहा कि इसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।
मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने सोशल मीडिया पर कहा कि अध्ययन के नतीजों को चुनिंदा तरीके से दिखाया जा रहा है, ताकि एक गुमराह करने वाली धारणा बनायी जा सके और साफ किया कि यह सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं निर्वाचक सहभागिता कार्यक्रम (एसवीईईएनपी) के तहत मतदाता जागरूकता का एक एंड-लाइन प्रशासनिक मूल्यांकन था, नहीं कि कोई राजनीतिक जनमत सर्वेक्षण। उन्होंने अध्ययन के लिए राज्य सरकार की मंजूरी से इनकार नहीं किया, लेकिन यह भी कहा कि श्री गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोप अभी भी सही हैं।










