
नई दिल्ली। महिला आरक्षण बिल पर बेशक केंद्र सरकार सदन में हार गई हो, लेकिन महिलाओं के दिल में सरकार ने अलग ही जगह बना ली है। कांग्रेस सहित अन्य दल, जो नारी शक्ति के उत्थान के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते थकते नहीं थे, आज उन्हीं ने महिलाओं से बराबरी का हक छीनने का काम किया है। महिला आरक्षण बिल से जुड़ा संविधान (131वां) संशोधन बिल मोदी सरकार लोकसभा में पास नहीं करा पाई, लेकिन यह मोदी की हार नहीं है। यह उस नारी शक्ति की हार है, जिसे विपक्ष ने हारने पर मजबूर कर दिया। उनका हक छीन लिया। आखिर कांग्रेस को महिलाओं से कौन सा भय था। विधेयक में स्पष्ट प्रावधान था कि संसद की 543 सीटों को बढ़ाकर 850 सीटें की जा सकती हैं।
यानी वर्तमान में जो पुरुष सांसद थे, उनकी सीटें तो बरकरार रहनी थीं। बिल पर हुई वोटिंग में लोकसभा में 528 सांसदों ने वोट डाले, जिसमें पक्ष में 298, और विपक्ष में 230 मत पड़े। बिल को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी। 528 का दो तिहाई 352 होता है। इस तरह यह बिल 54 वोट से गिर गया। महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल गिरते ही सरकार ने इससे जुड़े दो बिल पेश नहीं किए। कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री प्रियंका गांधी, जो कि खुद एक महिला हैं का कहना था कि यह हमारे लोकतंत्र और हमारे देश की एकता के लिए एक बड़ी जीत है। आखिर वह ऐसा कैसे कह सकती हैं, क्या वह खुद महिलाओं को बराबरी का हक देने से वंचित रखना चाहती हैं।
12 साल के शासन में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार सदन में कोई बिल पास नहीं करा पाई। बिल पर वोटिंग से पहले अमित शाह ने एक घंटा स्पीच दी थी और कहा था कि अगर ये बिल पास नहीं होते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी विपक्ष की होगी। देश की महिलाएं देख रही हैं कि उनकी राह का रोड़ा कौन है। यहां पर तो शोर-शराबा करके बच जाओगे, लेकिन माताओं-बहनों का आक्रोश बाहर पता चलेगा। जब चुनाव में वोट मांगने जाएंगे, तो मातृशक्ति हिसाब मांगेगी। लोकसभा में बिल गिरने के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह महिला आरक्षण विधेयक नहीं था, बल्कि चुनावी ढांचे को बदलने की कोशिश थी। यह संविधान पर आक्रमण था, इसलिए इसे हमने गिरा दिया है। इसके साथ ही कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महिला आरक्षण लागू करने चाहते हैं, तो 2023 में पारित बिल को लागू करें। कांग्रेस पार्टी उनके साथ है।








