
नई दिल्ली। साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच पैदा हुआ सैन्य गतिरोध हाल के वर्षों की सबसे गंभीर सीमा परिस्थितियों में से एक था। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर देश के भीतर भी कई तरह की राजनीतिक और रणनीतिक चर्चाएं हुईं। इन्हीं बहसों के बीच तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अब स्थिति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। एक इंटरव्यू में जनरल नरवणे ने साफ तौर पर कहा कि उस कठिन समय में भारतीय सेना को न तो सरकार ने अकेला छोड़ा था और न ही देश ने। उन्होंने उन दावों को खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि सेना को बिना स्पष्ट निर्देश के हालात से निपटने के लिए छोड़ दिया गया था।
उनके मुताबिक, उस समय हर स्तर पर सेना को पूरा समर्थन मिला और निर्णय लेने में किसी तरह की बाधा नहीं थी। जनरल नरवणे ने बताया कि जब चीनी सेना के साथ तनाव की स्थिति बनी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से स्पष्ट निर्देश था कि जमीन पर मौजूद सेना जो उचित समझे, वही कार्रवाई करे। उन्होंने इसे सरकार के उस विश्वास का प्रतीक बताया, जो सेना की पेशेवर क्षमता और निर्णय लेने की योग्यता पर जताया गया था। उनके अनुसार, सरकार का मानना था कि सीमा पर वास्तविक स्थिति को सबसे बेहतर तरीके से सेना ही समझ सकती है, इसलिए उसे निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता दी गई। पूर्व सेना प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि एलएसी पर बदलती परिस्थितियों के बीच भारतीय सेना को हर जरूरी कदम उठाने का अधिकार दिया गया था।चीन की ओर से यथास्थिति बदलने की कोशिशों का जवाब देने के लिए सेना को पूरी छूट थी।







